अनशनरत छात्र नेता श्री शुभम रेवाड़ से एसएमएस अस्पताल में मुलाकात के बाद मीडिया से बातचीत की :
दिनांक
05/08/2026 |
स्थान
जयपुर
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पत्रकार: सर, आप शुभम से मिले हैं, आपने बातचीत की है ?
जवाब : लंबे अरसे से सभी लोग मांग कर रहे हैं, शुभम भी मांग कर रहा था कि चुनाव होने चाहिए। यह समझ के परे है कि चुनाव क्यों नहीं करवा रही सरकार? हमारे वक्त में चुनाव उस साल हमने इसलिए नहीं करवाए थे, चुनाव के आचार संहिता लागू होने वाली थी। तो हमने कहा कि यह समाप्त होते ही चुनाव होंगे। और लगातार हम लोग पैरवी कर रहे हैं, सोशल मीडिया में लिख रहे हैं। यह पॉपुलर डिमांड है राजस्थान के नौजवानों की।
सबको मालूम है कि छात्र संघों से निकले हुए लोग कहां तक पहुंचे? इनको नहीं मालूम एबीवीपी वालों को? अरुण जेटली जी थे केंद्र में वित्त मंत्री, वो भी छात्र संघ अध्यक्ष थे दिल्ली के अंदर। यहाँ हमारे रघु शर्मा जी हैं, महेश जोशी जी हैं, राजेंद्र राठौड़ जी हैं जो इनके खुद की पार्टी के नेता हैं। आप बताइए कितने लोग पहुंचे हैं जो कि छात्र राजनीति से आए । मैं खुद हूँ, मैं तो चुनाव हार गया था छात्र संघ का, जिनके नाम मैं ले रहा हूँ चुनाव जीते हुए थे और मैं हार के भी पहुँच गया जहाँ पहुँचना था मुझे।
तो यह कोई बात नहीं हो कि आप चुनाव बंद करके जो नई पीढ़ी आने वाली है, अभी जेन - ज़ी आने के बाद में इनको समझ में नहीं आ रही है क्या कि जेन - ज़ी की ताकत क्या होती है ? भारत सरकार को भी झुका दिया, इस्तीफा होना पड़ा शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान जी का।
तो सरकार को समझना चाहिए, आगे आ के बात करनी चाहिए। इसको गंभीरता से लेना चाहिए। 15 दिन हो गए आज भूख हड़ताल पे, पानी पीना छोड़ दिया, मैंने जबरदस्ती पानी भी पिलाया उनको अभी।
तो आप मुझे बताइए कि एक इंसान अगर अपनी भावना रिप्रेजेंट कर रहा है लाखों बच्चों की, छात्रों की, मेरे वक्त में ही गुरुचरण छाबड़ा जी ने नशामुक्ति को ले के तीन बार उन्होंने अनशन किया, इसी SMS के अंदर। तब मैं खुद फोन करता था उनको, एज़ ए मुख्यमंत्री , समझाता था उनको, मेरे मंत्रियों को मैंने भेजा उनके पास में, आखिर में हमने समझौता करके उनका तुड़वाया अनशन। तीसरी बार मेरी सरकार चली गई थी, फिर वो अनशन में बैठ गए। वो भारतीय जनता पार्टी के एमएलए रहे हुए थे। अफसोस इस बात का, उनकी पार्टी का पूर्व एमएलए था, वरिष्ठ नेता था, वही 15 दिन तक भूख हड़ताल करते रहे, कोई नहीं आया यहाँ पर। तब मैं खुद आया यहाँ पर, विपक्ष में रहते हुए मैं आया। उनको मैंने बहुत समझाया। पर उन्होंने मेरी बात नहीं मानी, कि 'नहीं-नहीं, मैं बिल्कुल ठीक हूँ, यह है, वो है'। दूसरे दिन खबर आई कि वो सीरियस हो गए हैं और अगले दिन खबर आई कि वो मर गए।
कोई बीजेपी नेता, बड़े-बड़े उनके घर पर दाह संस्कार में नहीं जा पाए, इतना घबरा गए थे वो,गिल्टी कॉन्शियस थे। आखिर में छिप-छिप के गए उनके यहाँ बैठने के लिए। यह स्थिति थी, अभी तक मुझे याद है वो बात। उनके परिवार वाले लोगों ने बहुत आंदोलन चलाए बाद में , वो बंद हो गए।
तो कहने का मतलब यह है कि ऐसे मामलों में सरकार चाहे किसी पार्टी की हो, मुख्यमंत्री खुद को बात करनी चाहिए। उनके मंत्री बात करें और जो आमरण अनशन इन्होंने शुरू किया है उसको तुड़वाएं, यह मेरी मांग है मुख्यमंत्री से।
मैंने जयपुर कलेक्टर से बात करी है। उन्होंने विश्वास दिलाया कि मैं लगा हुआ हूँ, अधिकारियों से बात कर रहा हूँ और मैं बात पहुँचा रहा हूँ आप सब की वहाँ सीएमओ के अंदर। शाम को 4-5 बजे तक की बात करी है। शुभम ने कहा है कि 4-5 बजे का मुझे कहा गया है। मैंने इनको कहा अगर वो पॉजिटिव जवाब नहीं दें आपको, तब भी आप यह अनशन तोड़ो। हम सब मिलकर के आगे आह्वान करेंगे, बल्कि तुम आगे आओ। अगर वहाँ जेन - ज़ी दिल्ली में देश भर में आ सकते हैं सड़कों पर, यह भी मुद्दा ऐसा ही है। पूरे छात्र संघ इसमें सहयोग करेंगे, हो सकता है एबीवीपी के छात्र भी साथ आ जाएंगे छात्रों के। मांग तो कॉमन मांग है, यह तो कोई कांग्रेस-बीजेपी की थोड़ी है! वो तो मुख्यमंत्री जी इनको चाहिए था ऐसी मांगों पर सकारात्मक दृष्टिकोण रखें, यह मेरा मानना है।
पत्रकार: सर, मूक- बधिर बच्चों की समस्याएं जो हैं , उन पर क्या कहेंगे ?
जवाब : मैं जा रहा हूँ, वहाँ जा रहा हूँ। टीचर नॉर्मल लगाए गए हैं, मूक-बधिर वालों की भाषा अलग होती है। वो साइन लैंग्वेज होती है । उससे वो समझते हैं कि कौन क्या बोल रहा है आपस के अंदर, बातचीत भी करेंगे तो साइन लैंग्वेज से करेंगे। मैंने तो खुद ने एक 40 साल पहले जब मैं एमपी बना, 45 साल पहले, मैंने खुद ने स्कूल खोली है मूक-बधिर की। मुझे मालूम है कि उनमें क्या-क्या समस्याएं आती हैं, अब तो कॉलेज बन गई हमारी जोधपुर के अंदर। तो यह तो सरकारी है, हमारी जो चल रही एनजीओ से चल रही है। यह सरकारी कॉलेज है, सरकारी कॉलेज में कमी है और वहाँ के बच्चे हड़ताल कर रहे हैं, तो इतनी संवेदनशीलता कौन दिखाएगा? सरकार को ही दिखानी पड़ेगी, यह मेरी मांग है। उनसे बातचीत भी करो तथा हल करो जो समस्याएं हैं।
सवाल : सर गर्भवती महिलाओं का एक बड़ा मामला सामने आया था, 104 एम्बुलेंस जो है वो ऑफ ट्रैक हैं , क्या रिएक्शन है आपका ?
जवाब : 104 तो बंद पड़ी हुई हैं , हमने वो क्या नाम था उसका? जननी सुरक्षा योजना, मैंने ही शुरू की 15 साल पहले। वो तमाम गाड़ियाँ बंद पड़ी हैं। अब बताइए, लगभग एक साल से बंद पड़ी हैं, तो बेचारी औरतों पर क्या बीत रही होगी ? आराम से गाड़ी जाती, लेके आती उनको गाँवों से भी अस्पताल में, प्रसव होता, वापस पहुँचाती। तो यह तमाम हरकतें जो सरकार कर रही है ना, यह उचित नहीं है। मैं कोई राजनीतिक बात नहीं करना चाहता, मैं चाहता हूँ मुख्यमंत्री जी तीनों बातों पर, चाहे वो हमारे डेफ एंड डम्ब हों, चाहे जननी सुरक्षा योजना है उसकी बात हो, और चाहे आपके यह शुभम की बात हो हड़ताल की, छात्र संघ चुनाव की घोषणा करें और उनको विश्वास दिलाएं कि आप तो हड़ताल तोड़ दीजिए, मेरे पर छोड़ दीजिए, इतना ही कह दीजिए। कम से कम हड़ताल तोड़ो उनकी, यह मेरा मानना है।
सवाल : सर, यह बीजेपी कह रही है संत रविदास का जो पाठ्यक्रम था वो कांग्रेस ने हटा दिया था ?
जवाब : इनकी बातों का क्या जवाब दूँ ? इनकी बातों में इनके कोई गंभीरता नहीं होती है, यह मैं कह सकता हूँ।
धरना दे रहे आनंदीलाल पोद्दार मूक बधिर विद्यालय के विद्यार्थियों से मुलाकात के बाद मीडिया से बातचीत की :
लोकसभा का मेंबर बना पहला काम मैंने किया, यह जो बच्चे हैं, डेफ एंड डम्ब ( मूक-बधिर), तो मैंने उन्हीं के लिए गांधी बधिर विद्यालय खोला था। आज इस बात को करीब 40 साल से ज्यादा हो गया। अब वो बढ़ते-बढ़ते कॉलेज बन गई है जोधपुर के अंदर।
इस प्रकार से मेरे को उस वक्त से मालूम है कि डेफ एंड डम्ब बच्चों की प्रॉब्लम क्या रहती है। आजकल तो बहुत ही आधुनिक तकनीकें आ गई हैं। हमारी गवर्नमेंट ने ही शुरू की थी देश के अंदर, बाद में भारत सरकार ने शुरू किया। 7 साल- 8 साल तक के बच्चों को जो है कॉकलियर इंप्लांट लग जाते हैं।
बच्चे का अगर बचपन में सरकार ऑपरेशन करवा देती है जैसे मैंने शुरू किया राजस्थान के अंदर, मेरे दूसरे कार्यकाल के अंदर, साढ़े 6-7 लाख का खर्चा आया। हमने जो भी बच्चा आया, सबका कॉकलियर इंप्लांट लगाया तो वो बच्चे उसके बाद में बोलना और सुनना सीख जाते हैं। जब सुनना सीखेंगे तो बोलना सीख जाते हैं। प्रॉब्लम आती है सुनने में। अगर पैदाइश से ही वो सुन नहीं सकता, तो ये बोलेगा क्या? जब सुनाई ही नहीं देता है तो कौन क्या बोल रहा है। तो ये जो नई तकनीक आई है, बहुत ही कारगर है। अब मैंने सुना भारत सरकार ने भी इसके ऊपर ध्यान दिया है। तो राजस्थान तो वो राज्य है।
अभी बच्चों की प्रॉब्लम यही थी, एक तो टीचर्स जो हैं, ये साइन लैंग्वेज होती है, बिना साइन लैंग्वेज के जो टीचर लगे हुए हैं अधिकांश, वो क्या पढ़ाएंगे जब उनको साइन लैंग्वेज खुद को नहीं आती है, इनको क्या पढ़ाएंगे? और ये तमाम बच्चे बड़े एक्सपर्ट बन गए हैं, काफी लोग, जो साइन लैंग्वेज से बातचीत कर सकते हैं सब।तो इनकी उस संबंध में समस्याएं हैं।
फिर व्यवहार क्या है टीचर्स का, इनके नियम-कायदे फॉलो होते हैं कि नहीं होते हैं, सरकार सुविधाएं देती है वो इन तक पहुंचती हैं कि नहीं पहुंचती हैं, बिल्डिंग जर्जर हालत में है, बाथरूम गंदे पड़े हैं, गंदगी साफ नहीं होती है, जनरल समस्याएं इन्होंने बताई हैं।
तो मैं मुख्यमंत्री को खुद लिखूंगा डी.ओ. लेटर, बताऊंगा कि मैं जाके आया हूँ और मेरा खुद का बैकग्राउंड इन्हीं की सेवाओं से शुरू हुआ है। मैं उनको अहसास करवाने की कोशिश करूँगा कि आप भी ध्यान दें। ये लड़के-लड़कियाँ यहाँ पर करीब 300 के लगभग पढ़ रहे हैं यहाँ पर। तो जब बोल नहीं सकते, सुन नहीं सकते, आप सोच सकते हो क्या बीत रही होगी। साइन लैंग्वेज ही है जिससे अपना वो जीवन बसर कर सकते हैं। ये बच्चे बड़े उम्र के हैं, इनका वो ऑपरेशन भी नहीं हो सकता है। ये स्थिति है।
तो इसलिए मैंने जान-बूझकर उचित समझा कि मैं खुद जाऊँ। अभी मिस्टर जूली साहब आके गए थे, वो विपक्ष के नेता हैं, वो भी उठाएंगे असेंबली में भी। वो भी लिखेंगे मुख्यमंत्री जी को, हम दोनों बात करेंगे आपस के अंदर। और जो भी हो सकता है।
ये संस्थान बहुत शानदार संस्थान है । पोद्दार जी के नाम से बनी है, 50 साल पहले बनी होगी, इसका अपना अलग महत्व है राजस्थान के अंदर। बाकी तो धीरे-धीरे पनपती हैं, सात हैं, आठ हैं, जो भी संस्थान हैं।
दुर्भाग्य है प्रदेश का कि मैंने जो बाबा आमटे विश्वविद्यालय खोला यहाँ निशक्तजनों के लिए, उसमें डेफ एंड डम्ब भी आते हैं, ब्लाइंड भी आते हैं, हैंडीकैप्ड भी आते हैं। वो विश्वविद्यालय कागजों के अंदर है। वीसी को बिठा रखा है ये शिक्षा संकुल के अंदर। सरकार की ये स्थिति है, ढाई साल से वो वीसी बिठा रखा है वहाँ पर। अब रिटायरमेंट हो गया उनका।
कुछ सेक्टर ऐसे होते हैं जहाँ राजनीति बीच में नहीं आती। उसमें तो सरकार को चाहिए चाहे कोई पार्टी के बच्चे पढ़ते हों, किसी परिवार के कोई, किसी पार्टी का कोई मतलब नहीं है। ये तो सेवा का काम है। इनकी सेवा करना, ईश्वर की सेवा करना है।